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साज़िश-ए मोहब्बत


 हाँ, ये पहली मरतबा मोहब्बत की बारिश हुई है !
जारा सोच विचार कर लो कही तो साज़िश हुई है !
जो कल परसों तक गर्दन नापते थे हमारी, 
आज कौन सी नुमाइश हुई है ! 
ज़िद में अडे थे हम भी नहीं जायेंगे उसके चौखट पर,
नजाने ये कहाँ से आज फरमाइश हुई है!! 


बिखरे से थे साख और दिल पे उदासी छाई है !! 

ढकोसलों के शहर में दीवाली आई है !! 

बात बात पर कहते थे हमें, तु क्या चीज हो !! 

आज उसी बारूद खाने में इक चिंगारी आई है ! 

इम्तहान मत लो मेरे सब्र का यह “सरगम”,

सारे जहाँ मे क़यामत आई है!! 

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शायरी - ज़िन्दगी के पन्नों से


ज़िंदगी के पन्ने 


 देखते ही देखते एक वर्ष भी बीत गया, ज़िन्दगी कि कारवाँ से इक लमहा मिट गया !!! 

कुछ यादें कुछ वादें, सिसकती तनहाई में अलविदा के प्याले, 

सुर संगीत, सरगम दे कर यूँ ही सब कुछ मिट गया!

देखते ही देखते ही देखते एक वर्ष भी बीत गया, ज़िन्दगी कि कारवाँ से इक लमहा मिट गया

**************

चाहत थी हमें चाँद सितारों की,

कहाँ जुगनूओं में उलझ गये!

निकले थें मंजिल की ओर इक चराग ले कर , 

इन अँधेरो से झुलस गये!!! 

वो ख़ाव वे ज़ुनून और वो तक़दीर की बिखरी लकिरें 

समंदर को पार कर के,

 कहाँ दरिया में उलझ गये!!!


***************

बिच भँवर में खो गयी है शाम, 

उलझनों में उलझन है ज़िन्दगी का नाम !!!

चलते चलो, प्रवाह से लड़ो धैरता से लो काम, कभी हार तो कभी जीत यही तो जीने का है नाम !!! 


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कविता

मोहब्बत का दर्पण 


मुहब्बत के वो दिन भी क्या दिन थे जहाँ ग़म ए सरगम रोज़ गाया करते थे !! 

वो मेरी इबादत थी और उसकी रोज़ा वो .....!!

वादा हमने भी किया था किसी से  और उसने भी ...

बस फर्क इतना था की हमारे वादे में वो थी, उसके इरादों में कई और ....!

 सौदा तो नहीं ना पर क्या था ...? 

समझते समझाते हम भी ना समझ हो गये और वो भी !! 

मैं उसके लिए रोता था .. बेशक वो भी रोती थी उसके लिए .. 

पर्दा था ..आइना था .. मोहब्बत की नुमाइश में दोनो का मुआईना  था !!

 ज़िस्म के ज़रूरतों में या मैं अंधा था या वो !!! 

सामने कभी लगा ही नहीं प्रीत नहीं था .... वहाँ प्रीत भी था वो भी थी और ....:

मैं कहीं दूर से क़रीब होने का मृगतिष्णा ले कर सौभाग्य स्वप्न में जी रहा था!!!! 

सरगम 

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शायरी: इज़हार ए इश्क़

 हम उसे बेइंतहा मोहब्बत करते हैं , ये बातायें कैसे ? उसकी ताबिज़ पर नाज़ है हमें , ये पैगाम पहुँचाये कैसे ? चन्द घड़ी ही तो हुई हैमुलाकात की, उसे पलकों में बिठायें  कैसे ? 

सुना है की वो प्यार में हद से गुज़र जाती है ,खुदको यक़ीन करयें कैसे !! दिल, दिमाग और आठों प्रहर की चैन, अब हम उस परलुटायें कैसे ? शरीक होती थी वो लाल किले के बंद कमरों में हमारे साथ, पर  हाथों पे हाथ मिलायें कैसे ? 

जलती थी वो भी हमें किसी और के साथ देख कर, वो आँखों में गुस्सा समझायें कैसे ? तक़दीर लिखी दी थी  ख़ुदा ने इक कुनबे में, वो जान तुम हो यह बतायें कैसे? मुकद्दर में मिली थी तनहाई हमें, इक बेनूर ज़िन्दगी, तेरे आगमन नें हज़ार रंग भर दी, तुझे बतलायेंकैसे !! 

सरगम 

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